"फिर मिलोगी" सिर्फ़ एक प्रेम कहानी नहीं है, यह उस अनकहे मोह का आख्यान है जो जीवन की भीड़ में खोकर भी स्मृतियों में जीवित रहता है। वसुधा की शादीशुदा ज़िंदगी में सूनापन है, लेकिन उसका दिल एक ऐसे एहसास में उलझा है जो बरसों पहले किसी ट्रेन यात्रा में मिला था—एक ऐसा संयोग जो कल्पना-सी प्रतीत होता है, लेकिन दिल से मिटता नहीं।
मधु चतुर्वेदी की लेखनी संवेदना, सौंदर्य और स्त्री-मन की महीन परतों को गहराई से उकेरती है। उपन्यास भाषा में बहता है, दृश्य रचता है और पाठक के भीतर एक हूक छोड़ जाता है। यह किताब उन सबके लिए है जिन्होंने कभी किसी को खोया है, लेकिन भुला नहीं पाए।
आपकी किताब पढ़ी। फिर मिलोगी
सच कहूं तो मन कितनी ही बार भाव विभोर हो गया
सब कुछ लिख दिया आपने । कॉलेज की जिंदगी । हॉस्टल की दुनिया और girs हॉस्टल की दुनिया , सच जिंदगी कितनी अपनी होती है हॉस्टल में। और वो चाय वाली बात, बहुत हसीं आई मुझे । अकेले ही हंसता रहा बहुत देर तक । पर बहुत दुख भी हुआ सना के बारे मैं पढ़कर , वो जिंदगी से भरी लड़की के साथ ईश्वर क्यों किया ऐसा। वसुधा कितनी मजबूर रही होगी जबकि सारा आसमान उसके कदमों में था। रूढ़िवादी समाज में लड़कियों को हमेशा ही बहुत दर्द सहना पड़ता है। सच में बहुत बहुत अच्छा लिखती है आप। पता नहीं यह आपकी खुद की कहानी है या किसी और की। लेकिन ये सच है कि हमारे भारतीय समाज की ज्यादातर लड़कियों वसुधा जैसी ही मजबूर है।

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