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केन्द्रीय विद्यालय क्र.1 जे।आर.सी. बरेली के blog पर आपका हार्दिक स्वागत है

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Friday, September 19, 2025

BOOK REVIEW: EVERYONE ON THIS TRAIN IS A SUSPECT BY BENJAMIN STEVENSON

 


"एवरीवन ऑन दिस ट्रेन इज़ ए सस्पेक्ट" (Everyone on This Train Is a Suspect) बेंजामिन स्टीवेंसन का एक मेटाफिक्शनल थ्रिलर उपन्यास है, जिसमें एक लेखक अर्नेस्ट कनिंघम ऑस्ट्रेलिया के एक लग्जरी ट्रेन पर हत्याओं की एक श्रृंखला का सामना करता है। यह पुस्तक द अनएक्सपेक्टेड सक्सेस ऑफ एव्रीवन इन माय फैमिली हैज़ किल्ड समवन की अगली कड़ी है, लेकिन इसे स्टैंडअलोन के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इसकी समीक्षाएं आम तौर पर इसे एक तेज़ गति वाली, मनोरंजक रहस्य कथा के रूप में वर्णित करती हैं, जिसमें लेखक अपनी ही शैली के बारे में एक मजाकिया टिप्पणी पेश करता है। 
पुस्तक की कहानी:
  • उपन्यास अर्नेस्ट कनिंघम का अनुसरण करता है, जिसे ऑस्ट्रेलिया के लग्जरी ट्रेन, द घान में एक साहित्यिक उत्सव में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
  • यात्रा के दौरान, एक लेखक और एक प्रकाशक की हत्या कर दी जाती है, और ट्रेन पर मौजूद सभी लोग संदिग्ध हो जाते हैं। 
पुस्तक की शैली और विषय:
  • यह पुस्तक मेटाफिक्शन की श्रेणी में आती है, जिसमें लेखक अपनी ही कहानी में ही एक पात्र के रूप में शामिल होता है और साहित्य तथा अपराध कथाओं पर व्यंग्य करता है।
  • उपन्यास में मृत्यु, संदिग्धों की पहचान करने और रहस्य को सुलझाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 
पाठकों की प्रतिक्रियाएँ:
  • समीक्षाएं बताती हैं कि उपन्यास तेज़ गति वाला, आकर्षक और मज़ेदार है।
  • यह एक स्टैंडअलोन के रूप में पढ़ा जा सकता है, लेकिन यह सीरीज़ के बारे में कुछ विस्तार प्रदान करता है। 
निष्कर्ष:
"एवरीवन ऑन दिस ट्रेन इज़ ए सस्पेक्ट" एक मनोरंजक और व्यंग्यात्मक रहस्य कथा है जो साहित्यिक उत्सव और अपराध को एक साथ जोड़ती है। 

पुस्तक समीक्षा : अक्टूबर जंक्शन लेखक : दिव्य प्रकाश दुबे

 

"अक्टूबर जंक्शन" दिव्य प्रकाश दुबे का एक हिंदी उपन्यास है। यह चित्रा और सुदीप की कहानी है, जो हर साल 10 अक्टूबर को बनारस में मिलते हैं। वे न तो दोस्त हैं, न प्रेमी, न ही विवाहित, लेकिन वे एक ख़ास तरह से करीब हैं जिसे परिभाषित करना मुश्किल है।

यह उपन्यास प्रेम, रिश्तों और समय के प्रवाह की प्रकृति की पड़ताल करता है। यह एक विचारोत्तेजक और मार्मिक कहानी है जो इसे पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक आपके साथ रहेगी।

लेखन सरल और सीधा है, लेकिन बेहद प्रभावशाली भी। दुबे में मानवीय भावनाओं के सार को पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। वे प्रेम, क्षति और लालसा के बारे में गहरी समझ और सहानुभूति के साथ लिखते हैं।

अक्टूबर जंक्शन के किरदारों को बखूबी विकसित किया गया है और वे सहज लगते हैं। चित्रा और सुदीप, दोनों ही जटिल और कमज़ोर व्यक्तित्व वाले हैं, लेकिन साथ ही वे बेहद मानवीय भी हैं। आप खुद को उनके लिए उत्साहित पाएंगे, भले ही वे गलतियाँ करें।

बनारस का परिवेश भी उपन्यास का एक पात्र है। शहर का सजीव वर्णन किया गया है, और वह पृष्ठ पर जीवंत हो उठता है। आप हवा में मसालों की खुशबू और बहती नदी की कल-कल सुनते हुए लगभग महसूस कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, "अक्टूबर जंक्शन" एक खूबसूरत और विचारोत्तेजक उपन्यास है। यह प्रेम, हानि और जीवन में अर्थ की खोज की कहानी है। मैं इसे उन सभी लोगों को पढ़ने की पुरज़ोर सिफ़ारिश करता हूँ जो विचारशील और रोचक उपन्यासों का आनंद लेते हैं।

पुस्तक समीक्षा : यार पापा लेखक : दिव्य प्रकाश दुबे

 



दिव्य प्रकाश दुबे लिखित उपन्यास "यार पापा" एक दिल छू लेने वाली कहानी है, जो एक लापरवाह युवक और एक शक्तिशाली पिता के रिश्ते पर आधारित है। यह पुस्तक दोस्ती और पारिवारिक बंधनों की जटिलताओं को सरल और सुगम भाषा में दर्शाती है, जहाँ पिता-पुत्री का रिश्ता एक 'यार' जैसा बन जाता है। यह कहानी मनोरंजन के साथ-साथ भावनात्मक गहराई भी प्रदान करती है, जिससे यह समकालीन साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखती है। 

पुस्तक की मुख्य बातें
  • कहानी का सार:पुस्तक एक ऐसे पिता और बेटी के रिश्ते को दर्शाती है जो औपचारिकताएं छोड़कर एक-दूसरे को 'यार' की तरह समझते हैं। यह एक लापरवाह युवक की यात्रा और एक पिता की शांत शक्ति के बीच टकराव की कहानी है। 
  • लेखन शैली:दिव्य प्रकाश दुबे की लेखन शैली सरल और हृदयस्पर्शी है, जो पाठक को कहानी से बांधे रखती है। 
  • पात्र:इसमें एक सफल वकील की भी कहानी है, जिसकी लॉ की डिग्री फेक निकली है और वो अपनी ही बेटी की नज़रों में बुरा इंसान बन जाता है। 
  • भावनात्मक जुड़ाव:यह पुस्तक दोस्ती और पारिवारिक रिश्तों की गहराई को उजागर करती है, जिससे यह बेहद मार्मिक बन जाती है। 
  • पठनीयता:पुस्तक की भाषा आसान और सरल है, इसलिए इसे एक या दो दिन में ही पढ़ा जा सकता है। 
निष्कर्ष
"यार पापा" उन लोगों के लिए एक बेहतरीन और अनुशंसित पुस्तक है जो एक दिल को छू लेने वाली, सरल और आधुनिक कहानी की तलाश में हैं। यह पुस्तक पाठकों का भरपूर मनोरंजन करती है और रिश्ते की जटिलताओं को नए तरीके से पेश करती है। 

BOOK REVIEW : फिर मिलोगी : लेखिका : मधु चतुर्वेदी

 

"फिर मिलोगी" सिर्फ़ एक प्रेम कहानी नहीं है, यह उस अनकहे मोह का आख्यान है जो जीवन की भीड़ में खोकर भी स्मृतियों में जीवित रहता है। वसुधा की शादीशुदा ज़िंदगी में सूनापन है, लेकिन उसका दिल एक ऐसे एहसास में उलझा है जो बरसों पहले किसी ट्रेन यात्रा में मिला था—एक ऐसा संयोग जो कल्पना-सी प्रतीत होता है, लेकिन दिल से मिटता नहीं।

मधु चतुर्वेदी की लेखनी संवेदना, सौंदर्य और स्त्री-मन की महीन परतों को गहराई से उकेरती है। उपन्यास भाषा में बहता है, दृश्य रचता है और पाठक के भीतर एक हूक छोड़ जाता है। यह किताब उन सबके लिए है जिन्होंने कभी किसी को खोया है, लेकिन भुला नहीं पाए।

आपकी किताब पढ़ी। फिर मिलोगी 

सच कहूं तो मन कितनी ही बार भाव विभोर हो गया 

सब कुछ लिख दिया आपने । कॉलेज की जिंदगी । हॉस्टल की दुनिया और girs हॉस्टल की दुनिया , सच जिंदगी कितनी अपनी होती है हॉस्टल में। और वो चाय वाली बात, बहुत हसीं आई मुझे । अकेले ही हंसता रहा बहुत देर तक । पर बहुत दुख भी हुआ सना के बारे मैं पढ़कर , वो जिंदगी से भरी लड़की के साथ ईश्वर क्यों किया ऐसा। वसुधा कितनी मजबूर रही होगी जबकि सारा आसमान उसके कदमों में था। रूढ़िवादी समाज में लड़कियों को हमेशा ही बहुत दर्द सहना पड़ता है। सच में बहुत बहुत अच्छा लिखती है आप। पता नहीं यह आपकी खुद की कहानी है या किसी और की। लेकिन ये सच है कि हमारे भारतीय समाज की ज्यादातर लड़कियों वसुधा जैसी ही मजबूर है।